Thursday, December 4, 2008

अच्छा ही तो रहा..

कल सुबह-सुबह तैयार हो गया.. मेरे साथ मेरा बैग भी तैयार हो गया.. कपडे़, खिलौने, सिपर, बिछौना, ओढ़ना.. और खाना भी.. उपमा, सेरेलेक, बिस्किट और केला...


सुबह साढे़ नौ बजे मम्मी पापा के साथ आंटी के घर गया.. पहली बार तो आंटी की गोद में जाने से मना किया लेकिन दुबारा कहने पर लपक कर उनकी गोद में चला गया.. मुझे आंटी के पास छोड़ पापा मम्मी ओफि़स चले गये..

नया माहौल, नये लोग लेकिन मैनें जल्द ही दोस्ती कर ली, फिर तो अंकल-आंटी के साथ खूब खेला.. पहले तो खाना खाने में आनाकानी की लेकिन भूख तो लगती है न? थोड़ी देर के बाद खाना भी खा लिया.. थोड़ी देर सोया भी... हाँ मम्मी को बहुत miss किया.. उनके आँचल में लिपटने का मौका नहीं मिला न..

दोपहर ढ़ाई बजे पापा-मम्मी आ गये.. आटीं ने उनसे कहा कि "ये मेरे पास रह लेगा"...  फिर तो खूब प्यार मिला.. आखि़र पाँच घण्टे का कोटा बकाया था न...

आप ही बताओ अच्छा ही तो रहा मैं?

Wednesday, December 3, 2008

दुविधा

आदि के जन्म के बाद से ही अंजु (आदि की मम्मी) ने ओफि़स से छुट्टी ले रखी थी... लगभग साढे़ आठ माह से.. अंजु के ओफि़स को लेकर काफी दुविधा बनी हुई थी.... अगर अंजु ओफि़स जाती है तो आदि का ख्याल कौन रखेगा..क्या करे क्या नहीं.. काफी समय से सोच विचार चल रहा था..? और फैसले वक्त पर छोडे़ हुए थे.... अंजु लंबा अवकाश ले या फिर आदि को क्रेच में छोडे़... आदि को क्रेच में छोड़ने का विचार ही उदास करने जैसा है.. प्यारे आदि को कैसे किसी के भी पास छोड़ दे.. और कई लोगों से कई तरह के अनुभव भी सुने.. आखिर तय किया कि पता लगाया जाये क्रेच के नाम पर क्या विकल्प है.. लोगों से बात हुई.. गूगल की मदद ली और फिर कुछ जगह चक्कर लगाये.. कुछ ने कहा कि छोटे बच्चों (डेढ़ साल से कम) को नहीं रखते.. और जो कुछ तैयार हुए, वहां कि सफाई और अन्य चीजें देखकर तौबा कर ली.. अब कोई विकल्प नहीं था.. लगभग तय कर लिया था कि अंजु लम्बा अवकाश लेकर आदि का ख्याल रखेगी.....
इसी बीच एक नया विकल्प सामने आया.. पडौ़स की एक आंटी आदि को अपने पा़स रखने को तैयार हो गई.. सभी कुछ ठीक लग रहा है... घर के एकदम पास (बस एक फ्लोर ऊपर).. और घरेलु माहौल.. व्यवसायिकता से कुछ दूर...
सोचा है ये विकल्प आजमाने का... शुरु में सप्ताह में एक या दो दिन कुछ घण्टों के लिये.. और अगर आदि का मन लगता है और आदि अच्छा रहता है.. तो फिर धीरे धीरे...ज्यादा देर के लिये..
बहुत मुश्किल निर्णय है, पर.. क्या करें एकल परिवार में रहतें है.. तो आज आदि आंटी के पास..


Tuesday, December 2, 2008

दो गोली सुबह - दो गोली शाम

आज मेरा मंथली बर्थडे है.. ठीक पहचाना आज मैं पूरे सात माह का हो गया.. पिछले कई महिनों से आप सभी से नियमित मिलना हुआ और आपका बहुत प्यार मिला.. सच कहे तो बहुत मजा़ आ रहा है... आपका प्यार और आशीष हमेशा यूँ ही मिलती रहे..

अब आपको बताता हुँ कि आजकल नया क्या है? सभी कहते है कुछ समय में मेरे दांत आने वाले है, और कहते है कि ये बहुत तकलीफ वाला अनुभव हो सकता है.. कुछ ने सलाह दी कि केल्शियम की गोली लेने से दांत आराम से आते है.. आयुर्वेदिक, एलोपेथिक और होम्योपेथिक सभी तरह के नुस्खों की सलाह मिली.. थोडे दिनों पहले जोधपुर से मुझसे मिलने घनश्याम अंकल आये थे.. उन्होने भी होम्योपेथिक दवा का नाम बताया.. पर बिना सलाह के कोई दवा थोड़ी न लेते है.. है न? तो पापा ने डॉ जीतु से बात की.. उन्होने सलाह दी कि इसके लिए डेन्टोन (DENTON) सबसे अच्छी रहेगी.. इससे केल्शियम तो मिलेगा ही, साथ ही पेट के लिये भी उपयोगी रहेगी..तो अब मैं रोज चार गोली खाता हूँ.. पीस कर.. दो गोली सुबह - दो गोली शाम..

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