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Sunday, July 12, 2009

हैदराबाद से एक गिफ्ट

पिछले सप्ताह पापा हैदराबाद गये थे.. और वहाँ मिले थे सागर अंकल.. वो ही सागर अंकल जो ’दस्तक’, ’तकनीकी दस्तक’ और ’गीतों की महफिल’ सजाते हैं.. पापा ने उनसे क्या बात की वो तो पापा ही बताऐगें मैं आपको ये बता सकता हूँ मुझे क्या मिला..

सागर अंकल मे मेरे लिये बैट बॉल का ये सेट भेजा..


और मेरे खिलौनों कि टोकरी में ये भी जुड़ गये..

ये रही छोटी सी बॉल... कहां भाग रही है?

चल मुँह में... आदि ये गुलाब जामुन नहीं है...

और ये देखे.. ये बड़ी बॉल है.. आदि छुप भी सकता है इसके पीछे..



थेंक्यु सागर अंकल!!!
कैसा लगा मेरा गिफ्ट? पसंद है..





मुलाकात सागर नाहर जी से
सागर जी से कुछ परिचय तो ब्लोग के जरिये था.. पर एक दिन सागर जी का एक मैसेज फेस बुक पर आया.. वो किसी पुराने दोस्त के बारें में पता करना चाहते थे जो जोधपुर में रहतें है.. खुशकिस्मती से मैं उन्हे जानता था और उनका नंबर सागर जी तक पहुँचा दिया.. और सागर जी अपने दोस्त से करीब २० साल बाद बात कर पाये..  इस बार जब हैदराबाद जाने का प्लान बना तो सागर जी को सुचित कर कहा "हो सके तो मिलते हैं..." सागर जी का जबाब मिला "हो सके तो नहीं पक्का मिलते हैं...." हैदराबाद पहुँच सागर जी संपर्क किया और उनके जन्मदिन के दिन उनके घर पहुँच गये.. अचानक पहुँचे तो खाली हाथ ही गये कुछ अजिब सा लग रह था पर सागर भाई से बात कर खाली हाथ कि चिन्ता नहीं रही.. भाभी के हाथ की बनी पॉव भाजी खाई... दोनों होनहार बालकों से मिले.. नाहर भाई कि कैफे भी देखी.. ढेर सारी बातें हुई और कुछ चर्चा हिन्दी के चिट्ठों कि भी.. सागर भाई ये नियमित लिखने का का निवेदन कर विदा ली.. खाली हाथ गये थे पर खाली हाथ नहीं आये.. सागर जी ने आदि के लिये ये प्यारा सा खिलौना गिफ्ट किया..
रंजन

Sunday, May 10, 2009

झूला झूल रहे नन्द लाल....

जन्म दिन के उपहार स्वरुप अर्पित और क्षितिज चाचा मेरे लिये झूला लाये....  पहले वो छत पर टांगने वाला झुला लाने वाले थे, पर हमारे यहाँ तो छत पर ऐसी कोई जगह ही नहीं है तो फिर उन्होने ये झूला पसंद किया...

ये झूला जब चंडीगढ़ से चला था तो पूरा पैक था... ७ तारिख को सुबह सुबह पापा अपने औजार लेकर इसे कसने बैठ गये... बहुत देर बाद भी कुछ नहीं हुआ तो मम्मी ने भी इसे कसने की कोशिश की...


आखिर में दोनों ने मिलकर ३ घंटे में मुश्किल से इसे ये रुप दिया....


और अब झूलने की मस्ती.. आराम से झूले पर बैठ जाओ सीट बेल्ट लगा कर

और फिर मस्ती ही मस्ती... अब तो खाना और खेलना झूले पर ही होता है.. और इसे घर में कहीं भी .

थेंक्यु अर्पित- क्षितिज चाचा, प्रदीप दादा और बीनू दादी..

आज मदर्स डे है...वैसे तो मुझे याद था पर कल ताऊ ने भी बता ही दिया... तो मम्मी के लिये एक बार फिर से ये मम्मा सॉन्ग, फिल्म दसवेदानिया से.. ये विडियो मम्मी को बेहद पसंद है...

हैप्पी मदर्स डे

Saturday, May 9, 2009

मैं तो साइकिल से जा रहा था......

जन्मदिन की तो बहुत बातें हो  गई.. अब जरा बात करतें है जन्म दिन पर मिले तोहफों की... इतने प्यारे और इतने सारे  गिफ्ट मिले है कि एक पोस्ट में लिखना मुश्किल है..... आज बताता हूँ अनामिका मासी (विभु-अनिमेष की मम्मी) मेरे लिये क्या लाई... मासी हैदराबाद से आई थी और पापा से पहले से तय कर रखा था कि वो दिल्ली में उनको साइकिल कि दुकान पर ले जायेगें..... १ मई को वो आई और दिन में पापा से साथ साइकिल की दुकान से मेरे लिये एक ट्राई साइकिल ले आई.. उन्होने तय किया कि आदि को ये २ मई को ही दिखायेगें और साइकिल दुसरे कमरे में रख दी...

दोपहर में बॉल से खेलते-खेलते मैं भी उसी कमरे में पहुँच गया.. थोड़ी देर बाद सब ढुढते हुऐ कमरे में आये तो मैं ऐसे पकड़ा गया..


ये आँखों की चमक देख रहे हो? नया गिफ्ट मिला है न?

ऐसे चलाऊंगा...

न न... मु्झे ऐसे साइकिल हाँकता देख मासी ने कहा "इसका कवर हटा दो..." और मैं सवार हो गया साइकिल पर...


इसमें सीट बेल्ट है और फुट रेस्ट भी...


खैर असली मजा आया तीन की सुबह जब ये साइकिल औपचारिक रुप से मेरे हवाले हो गई... और इसमें बजता है गाना "मौजा ही मौजा...." और शुरु हो जाता है मेरा डाँस... और इसमें नगाडे़ वाला गाना भी है....

कैसी लगी मेरी साइकिल?


जरा पंसद तो बताओ?
थेंक्यु अनामिका मासी
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